Gyaan Sangam
  • Home
  • Gyaan Sangam
  • Hindi Quotes
  • Health
Showing posts with label Gyaan Sangam. Show all posts
Showing posts with label Gyaan Sangam. Show all posts

Thursday, September 6, 2018

अपशब्दों से अपनी ही वाणी गंदी होती है।

 Updesh Kumari     September 06, 2018     Gyaan Sangam     1 comment   

     हमें कभी किसी को गालियाँ नहीं देनी चाहिए ,न ही अपशब्द कहने चाहिए। ऐसा करना अशिष्टता और असभ्यता है गालियों से अपनी ही वाणी और मन दूषित होते हैं। संस्कार गन्दे होते हैं। जिसे गालियाँ दी गई उसे वे नहीं लगती बल्कि स्वयं को लगती हैं। इसके लिए एक दृष्टांत देखिए ---
       एक दिन एक महात्मा एक गांव में से जा रहे थे। मार्ग में कुछ उद्द्ण्ड लोग खड़े थे। उन्होंने महात्मा को देखकर हंसी उड़ाना शुरू कर दिया। महात्मा पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उद्द्ण्ड लोगों ने देखा कि उनकी शरारत का महात्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे उसे तंग करना चाहते थे पर महात्मा तंग भी नहीं हुआ। इस बात से चिड़कर उन्होंने महात्मा को गालियाँ देनी आरंभ कर दी। सोचा ,अब तो महात्मा अवश्य चिढ़ेंगे ,किन्तु महात्मा अब रुककर शांत भाव से खड़े रहे। अंत में उद्द्ण्ड लोग थककर चुप हो गए।
        उनके चुप होने पर महात्मा ने कहा ---तुम कह चुके ,अब मेरी भी बात सुनो। उद्द्ण्ड लोग महात्मा की बात सुनने पर राजी हो गए। महात्मा ने उनसे पूछा --बताओ ,यदि तुम कोई वस्तु किसी को दान में दो और वह न ले तो वह वस्तु किसके पास रहेगी ?उद्द्ण्डों ने कहा ---दानदाताओं अथार्त हमारे पास ही रहेगी क्योंकि वह वस्तु तो हमारी है।
     बिलकुल सही कहा तुमने। इसी प्रकार तुमने जो गालियाँ दी वे मैंने नहीं ली। वे गन्दी गालियाँ तुम्हारे पास ही रह गई। तुम्हीं गालियों वाले बने रह गए। --महात्मा ने शांत भाव से कहा। यह सुनकर वे उद्द्ण्ड लज्जित हो गए और उन्होंने भविष्य में कभी गाली न देने और अपशब्द न कहने का वचन दिया।



Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Tuesday, September 4, 2018

माता के साथ -साथ पिता को भी देवतुल्य समझकर उनकी पूजा करनी चाहिए।

 Updesh Kumari     September 04, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

       माता -पिता जीते -जागते परमेश्वर हैं तथा उनकी उसी प्रकार पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार परमात्मा की। पूजा का यह अर्थ नहीं कि उनके आगे धूप और अक्षत रखो ,वरन उनसे अधिक श्रद्धा किसी में भी  न हो ,ऐसे भाव मन में रखने चाहिए। धन ,दौलत तथा आराम उनके आगे कुछ नहीं समझना चाहिए,उनके मान ,मर्यादा के लिए सदा तुम्हें तत्पर रहना चाहिए। आजकल युवक पद की प्रतिष्ठा में चूर होकर पिता का ऐसा अपमान कर देते  हैं कि उनके दिल को बहुत ठेस लग जाती है। इसका एक उदाहरण सुनिए -----
      तहसील बटाला गांव कादियान में साधारण वर्ग के सज्जन थे। उसने अपने इकलौते पुत्र को अपने पेट पर पत्थर रखकर ,अर्थात भूखा -प्यासा रहकर ,कठिन परिश्रम करके बहुत उत्तम शिक्षा दिलाई और फलस्वरूप लड़का डिप्टी कमिश्नर बना। जब बेटा इस पर पहुंचा तो उसको अभिमान हो गया। पर पिता को उसका पता न था ,क्योंकि वह पिता को प्रतिमास 25 रूपये भेज देता था। उसकी ख़ुशी की कोई सीमा न थी। वह सोचता ,न जाने मेरा पुत्र कितना भक्त है। पिता के मन में विचार आया कि एक बार जाकर अपने पुत्र को अपनी आँखों से देख आऊं।
 पिता अपने मन में अनेक अभिलाषा लेकर गया। पर वहां का रंग -रूप देखकर उसके नेत्रों के सामने अन्धेरा छा गया ,क्योंकि एक पुरुष ने उसके पुत्र से पूछा -यह कौन है !तो उसने कहा -अरे ,यह तो मेरा पुराना नौकर है। इतनी बात सुनकर पिता पृथ्वी पर गिर गया। उसको इतना शोक हुआ जिसके फलस्वरूप उसकी तत्काल मृत्यु हो गई ,क्योंकि उसकी आशाओं पर पानी फिर गया था।
             पिता के अपमान की यह कोई अनोखी घटना नहीं है। कितनी लज्जा की बात है कि जो माता -पिता अपनी संतान पर सर्वस्व न्यौछावर करके योग्य बनावे ,उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाए। ऐसी बात कभी छिपती भी  नहीं ,जब लोगों को असली बात का पता चलता है तो उन्हें घृणा की निगाहों से देखा जाता है क्योंकि लोग समझ जाते हैं कि जो अपने माँ -बाप का नहीं हुआ ,वह हमारा क्या बन सकेगा।
      जब आप किसी कार्य को करें तो विचार लेना चाहिए कि मुझे कोई ऐसा बुरा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे माता -पिता का अपमान हो। उनका आदर करने से प्रत्येक कार्य में वे आपको हृदय से आशीष देंगे और यह आशीर्वाद पाकर आप जीवन में सदा सुखी रहेंगे। हमारे धर्मशास्त्रों का भी यही आदेश है --मातर देवो भव पितर देवो भव ,अर्थात माता -पिता को देवतुल्य समझकर उनकी पूजा करनी चाहिए। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Monday, September 3, 2018

माँ का कलेजा बोला --मेरे बच्चे ! चोट तो नहीं आई कहीं ?

 Updesh Kumari     September 03, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

    माता- पिता केवल जन्म ही नहीं देते वरन हर प्रकार से लालन -पालन कर अपने बालक को उन्नति के शिखर पर पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। गरीब से गरीब माता -पिता अपने बच्चों को सुखी बनाने के लिए भूखे -प्यासे रहकर अनेक प्रकार की यातनाए सहते हैं। उनकी हार्दिक इच्छा होती है कि उनके बच्चे विद्या पढ़कर महाविद्वान बनें और सूर्य के समान चमकते हुए यश और कीर्ति के शिखर पर पहुँचें। माता -पिता ही ऐसे व्यक्ति हैं जो बच्चों का कभी अहित नहीं सोच सकते। यदि कोई बच्चे का अहित करे भी तो वे वाद -विवाद पर उतर आते हैं।
        बड़े दुःख से कहना पड़ता है कि माता -पिता की इतनी ऊँची भावनाओं को भी हमारे युवा नहीं समझते और नासमझी में कई प्रकार की ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जो उन्हें नहीं करनी चाहिए। इससे संबंधित एक घटना है।
    एक समय की बात है ,एक नवयुवक वेश्यागामी था और एक वेश्या से अति प्यार करता था। यहाँ तक कि प्रत्येक वस्तु प्रेम के आगे न्योछावर करने को तैयार रहता था। एक दिन वेश्या ने पूछा -क्या आप सचमुच ही मुझसे प्रेम करते हैं ? उसने कहा -क्या इसमें भी संदेह है ?वेश्या ने कहा -अच्छा तो फिर तुम अपनी माँ का कलेजा लाकर दो तब मुझे यकीन आयेगा। वह नवयुवक भागता हुआ अपनी माँ के पास गया और उसको मारकर कलेजा लेकर एकदम वेश्या के पास पहुँच ही रहा था कि मार्ग में ठोकर खा कर गिर पड़ा। तभी माँ का कलेजा बोला --मेरे बच्चे !चोट तो नहीं आई कहीं ?
          पर उस मदमस्त युवक को होश कहाँ ?वेश्या के पास जाकर कलेजा रख दिया। पर प्रसन्न होने के बदले वह गुस्से में बोली --अरे दुष्ट !तूने अपनी माँ का प्रेम न समझा तो मुझे क्या समझेगा ?कहने का अभिप्राय यह है कि वेश्या के हृदय में भी माँ के प्रति कितने पवित्र भाव थे ,जिन्होंने उस युवक की आँखें खोल दी।
    ऐसी ममतामयी माता के साथ प्रत्येक को प्रीतियुक्त भाव से व्यवहार करना चाहिए। कभी भूल कर भी उनसे कोई कटु एवं अपशब्द नहीं कहने चाहिए। माता -पिता की सेवा श्रद्धा से करनी चाहिए। जो माता -पिता की सेवा नहीं करता वह कृतघ्न है। उसकी संताने, उसकी भी सेवा नहीं करेंगी। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Saturday, September 1, 2018

मोक्ष प्राप्त करने का अवसर केवल मनुष्य जन्म में ही मिलता है।

 Updesh Kumari     September 01, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

     संसार रूपी मकान से निकलकर मोक्ष प्राप्त करने का अवसर केवल मनुष्य जन्म में ही मिलता है। मनुष्य कर्मफल के अनुसार पशु -पक्षियों ,कीट -पतंगों की योनियों में भटकता है। जब कभी मनुष्य जन्म मिलता है तो उसे विषय -वासना रूपी खुजली मन में उठती है और वह उसके चक्कर में पड़  जाता है। बस ,मनुष्य जन्म रूपी दरवाजा निकल जाता है और वह विविध योनिओं में भटकता रहता है। मनुष्य के साथ हर जन्म में वही होता है जो अंधे व्यक्ति के साथ हुआ।
         एक अन्धा किसी बड़े भारी मकान के भीतर बंद हो गया। अब बेचारे को मार्ग मिलना कठिन हो गया ,परन्तु अंधे ने एक युक्ति सोची कि यदि मैं दीवार पकड़े -पकड़े इसके सहारे चलूँ तो दरवाजा अवश्य मिल जाएगा। अंधे ने ऐसा ही किया ,परन्तु दीवार पकड़े -पकड़े जब भी वह दरवाजे के सामने आता ,तो उसकी देह में खुजली उठती जिससे वह दोनों हाथों से दीवार का सहारा छोड़ खुजलाने लगता। इसी भाँति उसने सैकड़ों चक्कर लगाए ,पर हर बार दरवाजा निकल जाता था वह यों ही हाथ मलता रह जाता था।
इसका भाव यह है कि यह जीवात्मारूपी अन्धा पुरुष जन्म -जन्मांतर रूपी मकान के घेरे में पड़ा उससे निकलने का प्रयास करता है। यह ज्ञात रहे कि अंदर से निकलने का दरवाजा एकमात्र मनुष्य -योनि है। जब मनुष्य जन्म मिलता है तब -तब उसमें विषय -वासना रूपी खुजली उठा करती है ,विषयों में ही इसकी उम्र व्यतीत हो जाती है और मनुष्य -शरीर -रूपी दरवाजा निकल जाता है। जन्म -जन्मांतर तक जीव विभिन्न योनियों में भटकता रहता है।  
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Friday, August 31, 2018

बुरी संगति में न बैठिए ,क्योंकि बुरी संगति अच्छी नहीं होती।

 Updesh Kumari     August 31, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

    किसी ने ठीक ही कहा कि बुरी संगति अच्छी नहीं होती। कहावत है कि शराब बेचने वाले की लड़की यदि दूध लेकर जाती हो तो लोग यह सोचेंगे कि यह शराब ले जा रही है। इसी परका दुष्ट और शैतान लोग शरारत करके मौके से भाग जाते हैं और बदले में शरीफ पकड़े जाते हैं ,अतः दुष्टों का साथ क्षणभर के लिए भी नहीं करना चाहिए।देखिए  दुष्ट कौवे का संग पाकर कैसे हंस को अपनी जान गँवानी पड़ी।
         एक दिन शिकारी जंगल में शिकार करने आया। शिकार करने के बाद कुछ देर आराम करने का विचार करते हुए वह उस वृक्ष के नीचे जा पहुंचा जहाँ हंस व कौआ रहते थे। शिकारी पेड़ के नीचे लेट गया। थका हुआ था ,इसलिए नींद आ गई। हंस और कौआ यह सब देख रहे थे। थोड़ी देर में शिकारी पर धूप पड़ने लगी। जब हंस ने देखा कि शिकारी पर धूप की किरणें पड़  रही हैं ,तो अच्छाई के मार्ग पर चलते हुए वह पेड़ की डालियों में अपने दोनों पंख फैलाकर बैठ गया ,जिससे धूप की किरणें नहीं पहुंचती थी।
      इतने में कौवे को शैतानी सूझी ,क्योंकि यह उसका स्वभाव था। उसने उस शिकारी के मुँह पर  मल -मूत्र त्याग दिया और पेड़ से उड़ गया। शिकारी को बहुत बुरा लगा। उसने अपने चारों तरफ देखा। उसे केवल हंस दिखाई दिया। शिकारी ने सोचा कि यह सब इसी हंस ने किया है। क्रोध में आकर शिकारी ने पास पड़ी बंदूक उठाई और हंस पर निशाना लगाया और धांय से गोली हंस को लगी। हंस नीचे गिर पड़ा। हंस ने कभी ऐसा सोचा भी नहीं था। यदि वह दुष्ट कौवे के साथ न रहता तो हंस बे -मौत  न मारा जाता। अतः दुष्ट का संग कभी नहीं करना चाहिए नहीं तो बाद में पछताना पड़ता है। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Thursday, August 30, 2018

ईर्ष्या एक शीतल आग है जो मनुष्य को धीरे -धीरे जला डालती है।

 Updesh Kumari     August 30, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

    मनुष्य में परस्पर ईर्ष्या का परिणाम नहीं होता। स्वयं यदि प्रतिष्ठा प्राप्त करनी हो तो अपने योग्य साथियों को भी प्रतिष्ठित करना होगा। ईर्ष्या से जहां मानसिक अशांति रहती है ,वहां साथ ही अपमान भी होता है। ईर्ष्या एक शीतल आग है जो मनुष्य को धीरे -धीरे जला डालती है। जैसा कि दो विद्वान् पंडितों के साथ हुआ।
          एक बार एक सेठ ने दो विद्वान् पंडितों को भोजन पर आमंत्रित किया। समय पर दोनों पंडित पधारे तो सेठ ने उनका स्वागत किया। उनको आदर से आसन पर बैठाया। उनमें से एक पंडित जब स्नान करने के लिए गए तो सेठ ने दूसरे पंडित से कहा ,महाराज !ये आपके साथी तो महान विद्वान् मालूम लगते हैं ?पंडित जी ने उत्तर दिया --यह और विद्वान् ?क्या बात करते हो सेठ जी ! यह तो निरा बैल है बैल।
       सेठ को बहुत बुरा लगा ,किन्तु वह चुप ही रहा। पहले पंडित जी जब स्नान करके वापस आए तो दूसरे पंडित जी स्नान करने के लिए गए। सेठ ने उनसे भी वही प्रश्न किया ,महाराज !आपके साथी तो महान विद्वान् लगते हैं ?पंडित जी बोले -सेठ जी किसने बहका दिया आपको ?वह तो निरा गधा है गधा। सेठ इस समय भी मौन ही रहा।
    जब भोजन का समय आया तो सेठ ने चांदी की थाली में ढककर एक पंडित के आगे घास रख दी और दूसरे के आगे भूसा रख दिया। दोनों के बैठने पर सेठजी ने निवेदन किया कि भोजन प्रारम्भ कीजिए  पंडितों ने जब ढक्क्न उठाया तो उस भोजन को देखकर दोनों पंडित क्रोध से तमतमा उठे। बोले -हमारे अपमान का आपमें साहस कैसे हुआ ?
सेठ ने हाथ जोड़कर नम्रता से कहा -मैनें तो आप लोगों के कथन अनुसार ही आप लोगों के सम्मुख भोजन परोसा है। आपने इनको बैल बताया था और इन्होंने आपको गधा बताया था। सो वैसा ही भोजन मुझे मंगाना पड़ा। इसमें मेरा क्या दोष है। पंडितजी !मैं तो आप दोनों को विद्वान् समझता था ,इसीलिए आमंत्रित किया था ,किन्तु वास्तविकता का ज्ञान तो आप लोगों से प्राप्त हुआ है। सेठ की बात सुनकर दोनों पंडित मन -ही -मन लज्जित हुए। ये है एक दूसरे की बुराई करने का नतीजा।  
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Wednesday, August 29, 2018

दान व त्याग से मनुष्य का मान -सम्मान बढ़ता है।

 Updesh Kumari     August 29, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

    समाज में रहते हुए मनुष्य को कमाना भी चाहिए और श्रद्धानुसार दान भी अवश्य करना चाहिए। इससे उसे समाज में सम्मान और इष्टलोक तथा परलोक में पुण्य मिलता है। एक दृष्टांत देखिए जिसमें एक कंजूस का हृदय परिवर्तन होता है और वह महान त्यागी और सम्मानित सेठ बन जाता है।
     एक नगर में एक कंजूस रहता था। उस कंजूस की कंजूसी सर्वप्रसिद्ध थी। वह खाने ,पहनने तक में भी कंजूस था। एक बार उसके घर से एक  कटोरी गुम हो गई जिसके दुःख में कंजूस ने तीन दिन तक कुछ न खाया। कंजूस की मोहल्ले में कोई इज्जत नहीं थी ,क्योंकि वह किसी भी सामाजिक कार्य में योगदान नहीं करता था।
एक बार उस कंजूस के पड़ोस में धार्मिक कथा का आयोजन हुआ। वेदमंत्रों व उपनिषदों पर आधारित कथा हो रही थी। कंजूस को सद्बुद्धि आई तो वह भी कथा सुनने के लिए सत्संग में पहुंच गया। वेद के वैज्ञानिक सिद्धांतों को सुनकर कंजूस को भी रस आने लगा। हालांकि उसे कंजूस समझकर उसकी कोई कदर न करता ,फिर भी वह कथा में प्रतिदिन आने लगा। कथा के समाप्त होते ही वह सबसे पहले मन की शंका पूछता। इस तरह उसकी रूचि बढ़ती गई।
       वैदिक कथा के अंत में लंगर का आयोजन था इसलिए कथावाचक ने इसकी सूचना दी कि कल लंगर होगा। इसके लिए जो श्रद्धा से कुछ भी लाना चाहे तो ले आना। अपनी -अपनी श्रद्धा के अनुसार सभी लोग कुछ न कुछ लाए। कंजूस के हृदय जो श्रद्धा पैदा हुई वह भी एक गठरी बांध सिर पर रखकर लाया। उसकी गठरी को देख लोग तरह -तरह के अनुमान लगाते और हंसते। लेकिन कंजूस को इसकी परवाह न थी।
       कंजूस ने आगे बढ़कर विद्वान् ब्राह्मण को प्रणाम किया। जो गठरी अपने साथ लाया था ,उसे उसके चरणों में रखकर खोला तो सभी लोगों की आंखें फ़टी -की -फ़टी रह गई। कंजूस के जीवन की जो भी अमूल्य सम्पत्ति गहने ,जेवर ,हीरे -जवाहरात आदि थे उसने सब कुछ को  भेंट कर दिया। उठकर वह यथास्थान जाने लगा तो विद्वान् ने कहा , ;महाराज !आप वहाँ नहीं ,यहाँ बैठिए।
  कंजूस बोला -पंडित जी !यह मेरा आदर नहीं है ,यह तो मेरे धन का आदर है ,अन्यथा मैं तो रोज आता था और यही पर बैठता था ,तब मुझे कोई न पूछता था।ब्राह्मण बोला --नहीं ,महाराज !यह आपके धन का आदर नहीं है ,बल्कि आपके महान त्याग का आदर है। यह धन तो थोड़ी देर पहले आपके पास ही था ,तब इतना आदर -सम्मान नहीं था जितना कि अब आपके त्याग में है इसलिए आप आज से सम्मानित व्यक्ति बन गए हैं। इस प्रकार त्याग की महिमा ने उसे कंजूस से सम्मानित सेठ बना दिया। उसके महान दान ने जीवन को सुधार  दिया।








Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Tuesday, August 28, 2018

संसार तो नाम ही खट -खट का है, इससे कहां तक बचोगे ?

 Updesh Kumari     August 28, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

लोग सोचते हैं कि घर के धंधों में प्रभु -भक्ति का समय ही नहीं निकलता। सब कुछ छोड़कर कहीं एकांत में भजन करेंगे। यही सोच लोग घर बार छोड़कर चल देते हैं ,परन्तु जंगल में भी वहीं दुनिया बस जाती है। आवास ,भोजन, वस्त्र  चेले -चेलियाँ ,धन आदि सब वहीं। फिर वहीं धंधे -हथकंडे। अतः घर छोड़ने का विचार जरूरी नहीं। जो करना है इसी खट -खट में कर लो। संसार तो नाम ही खट -खट का है। इससे कहां तक बचोगे।   
      इसके लिए एक दृष्टांत देखिए -एक अश्वारोही नवयुवक कहीं जा रहा था। मार्ग में एक कुंआ पड़ा ,जिसपर रहट चल रहा था। घुड़सवार ने सोचा कि घोड़े को पानी पिला लें ,तब आगे चलेंगे। वह घोड़े को कुंए पर लेकर गया। रहट की खट -खट की आवाज सुनकर घोडा चौंक गया। उसने मुँह हटा लिया। 
     नवयुवक ने कहा  --भाई साहब जरा रहट रोक लो तो मैं अपने घोड़े को पानी पिला लूँ। खट -खट की आवाज से यह चौंक रहा है। रहट चलने वाले ने कहा -भाई ,आवाज तब रुकेगी जब रहट रुकेगा ,फिर पानी आना भी बंद हो जायेगा तो क्या पिलाओगे ?अतः पिलाना ही है तो खट -खट में ही पिला लो ,नहीं तो घोडा प्यासा ही रहेगा।
   अतः प्रभु भक्ति करनी है तो संसार में रह कर ही करो ,कहीं बाहर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।


































































Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Monday, August 27, 2018

नाम-स्मरण की उचित विधि व ओउम का जाप कैसे हो ?

 Updesh Kumari     August 27, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

दिन और रात के संधिकाल में (प्रातः 4 से 5 बजे तथा सायं 6 से 7 बजे के बीच में )जब वातावरण शुद्ध -शांत और मधुर होता है ,कहीं शुद्ध -पवित्र समतल स्थान पर ,एकांत में ,जहां शुद्ध वायु का आवागमन हो ,वहां सुखावस्था में सीधे बैठकर प्रभु के निज नाम ओउम का अर्थपूर्वक अपने मन में जाप  करना तथा ईश्वर के गुणों को विचारते रहना और नाम -स्मरण में मग्न रहना ,यही नाम -स्मरण की सही व् उचित विधि है।
      संसार के सब विचारों को हटाकर केवल ईश्वर के गुणों को स्मरण करके ,स्वयं आनंदित होना ,प्रसन्नचित होकर उन गुणों का मस्तिष्क में साक्षात्कार करना यही प्रभु -स्मरण है। जैसे ईश्वर सर्वरक्षक है ,सबका स्वामी ,सर्वशक्तिमान है ,सर्वान्तर्यामी है ,हमारा माता -पिता -गुरु -मित्र -बंधु है ,वह न्यायकारी है ,दयालु -कृपालु है ,इसी प्रकार ईश्वर के गुणों को प्रत्यक्ष करना चाहिए। जब इन गुणों को धारण करने की हमने ठान ली है तो ईश्वर की भी हम पर दया -कृपा रहती है ,अतः ईश -नाम -स्मरण करना सार्थक हो जाता है। यही नाम की कमाई है जो हम कमा सकते हैं। जितनी अच्छाइयों को धारण करते हैं ,समझो उतनी अधिक ईश्वर के नाम की कमाई करते हैं। मृत्यु के समय यही नाम की कमाई साथ जाती है।
       केवल नाम -स्मरण से ,रटने से ,आँख बंद करके नाम जपने से कोई लाभ नहीं है ,व्यर्थ में समय गँवाना है। समय का सही सदुपयोग करना सीखें। भक्ति -भाव से जप करें तो आनंद आता है।
ओउम --नाम -स्मरण करते ही आपने अनुभव किया होगा कि प्रसन्नता की लहर हमारे दिलो -दिमाग में छा जाती है। सच्ची श्रद्धा और भक्ति से ओउम नाम जपने से जब आनंद की अदभुत अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि ईश्वर की हम पर कृपादृष्टि पड़ रही है। वक्त कैसे गुजरता है पता ही , नहीं चलता ,आनंद में डूबे रहते हैं ,कहां बैठे है कोई सुध -बुध नहीं रहती। केवल जाग्रतावस्था में नाम की कमाई होती है ,यही नाम -स्मरण है ,इसी को ध्यानावस्था भी कहते हैं। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Thursday, August 16, 2018

मोह -लालच में फंसकर मनुष्य जन्म -जन्मांतर तक नाचता रहता है।

 Updesh Kumari     August 16, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

मोह ,लालच ,तृष्णा के आकर्षण में मनुष्य फंसता ही रहता है। उसकी वही दशा होती है जो इस दृष्टांत में बंदर की हुई। एक बार एक मदारी ,जो बंदरों को नचाया करते हैं ,एक बंदर को पकड़ने गया। जिस बाग में बहुत से बंदर रहा करते थे ,वहां उसने गड्ढा खोदकर उसमे एक तंग मुँह का घड़ा गाड़ दिया ,जिसका मुँह ऊपर की ओर खुला था। पुनः एक रोटी ले बंदरों को दिखाते हुए तोड़ -तोड़कर उसमें डाल दी और आप वहाँ से हटकर आड़ में बैठ गया।
   बंदरों ने यह देखा और एक बंदर उतरकर घड़े में हाथ डाल रोटी के टुकड़ों को निकालने लगा ,किन्तु मुट्ठी बंद होने के कारण हाथ न निकल सका। तब तो बंदर बहुत खीझा और बड़े जोर -जोर से हाथ खींचता रहा तथा अपने ही हाथ को खींच -खींच काटता रहा ,पर हाथ तो तब निकले कि जब मूढ़ मुट्ठी की रोटी छोड़ दे और हाथ पतला हो जाए ,पर ऐसा न कर वह उसी रोटी के लालच से मदारी के हाथ पकड़ा जाकर जन्म भर नचाया गया।
      इस दृष्टांत का भाव यह है कि मनुष्य रूपी बंदर संसार रूपी घड़े में पंच विषय व पुत्र -पौत्र ,रुपया -पैसा रूपी रोटी को पकड़ मूढ़ अपने सारे कर्म -धर्मों को भुला देता है और ब्रह्मरूपी मदारी के हाथ पकड़ा जाकर जन्म भर नाचता रहता है।बंदर को तो मदारी एक ही जन्म नचाता है ,पर मनुष्य जन्म -जन्मांतर तक नाचता रहता है।  
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

स्वेच्छा से त्याग करने पर सुख व आनंद की अनुभूति होती है।

 Updesh Kumari     August 16, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

त्याग का आनंद अदभुत होता है। . अभावग्रस्त को कुछ देने के बाद आत्मा को संतोष और धर्मलाभ होता है। इसी प्रकार संसार से विदा होते समय यदि मनुष्य स्वेच्छा से संसार को त्याग दे तो उसे कोई कष्ट नहीं होता। स्वेच्छा से न त्यागने वाले रोते -विलखते हैं। पुनरपि संसार से जाना तो पड़ता ही है।
एक यजमान ने विशेष अनुष्ठान में आए दो साधुओं को एक -एक कंबल दे दिया। वे दोनों रात्रि विश्राम के लिए नगर की एक धर्मशाला में ठहर गए। सर्दी की रात थी। रात को सोते समय एक साधु के मन में आया कि कहीं रात  को कोई कंबल उठा न ले जाए। उसने लपेटकर उसे अच्छी तरह तह करके सिरहाने में लगाया और सो गया। जब दूसरा साधु सोने लगा ,उसने देखा कि दो बच्चे सर्दी से ठिठुर रहे हैं। उसने वह कंबल उन्हें दे दिया।
रात्रि में धर्मशाला में चोर घुस आए। उस रात्रि धर्मशाला में दो साधु व दो अनाथ बच्चों के अलावा कोई नहीं था। चोरों को चोरी के लिए केवल कंबल ही दिखाई पड़े। दोनों कंबल ले कर भाग गए। 
             सुबह जब दोनों साधु उठे तो दोनों में से किसी के पास कंबल नहीं थे। एक साधु ने स्वेच्छा से त्याग दिया और दूसरे का सिरहाने के नीचे खिसका लिया। जिसने स्वेच्छा से कंबल का त्याग किया था ,वह आनंद में था और सुबह उठकर अपने मार्ग पर चल दिया। दूसरे ने सिर के नीचे रखा था ,वह अत्यन्त दुखी था। जैसे दुखों का पहाड़ उसपर टूट पड़ा हो लेकिन जो सुख का आनंद पहले साधु ने कंबल त्याग कर लिया ,दूसरे साधु को इसकी अनुभूति तक नहीं थी। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Wednesday, July 25, 2018

कामी और लोभी व्यक्ति ही माया के शिकार होते हैं ,विरक्त नहीं।

 Updesh Kumari     July 25, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

छल -कपट ,विश्वासघात ,देशद्रोह ,हत्याएँ आदि का कारण लोभ और लालच ही है। यह सब भोगों के लिए हो रहा है। आश्चर्य यह है कि भोग ज्यों के त्यों हैं ,भोगने वाले नष्ट हो रहे हैं। इसके लिए एक दृष्टांत देखिए ---
एक विरक्त साधु सड़क पर जा रहे थे। मार्ग में उन्हें कुछ स्वर्ण मुद्राएँ पड़ी दिखाई दी। देखते ही वे चौंके और मार्ग से हटकर चलने लगे। थोड़ी दूरी पर उन्हें चार बंदूकधारी सिपाही मिले। साधु ने उनसे कहा बच्चा ,इस मार्ग से बचकर जाना ,रास्ते में एक डायन बैठी है।
सिपाही ने कहा -अरे बाबा !डायन से क्या डरना ,हरकत करेगी तो एक कारतूस उसपर दाग देंगे। थोड़ी दूर चलने पर उन्हें भी स्वर्ण मुद्राएँ पड़ी दिखाई दी। सबने मुद्राएँ बीनकर आपस में यह निश्चय किया कि पहले कुछ खा -पीकर आराम कर ले फिर गश्त पर चलेंगे। तय हुआ कि दो लोग मुद्राओं की रक्षा करें। दो सिपाही बाजार में गये और वहाँ से नमकीन व शराब में विष मिलाकर ले आए। उन्होंने सोचा -वहां जाकर कह देंगे कि हम दोनों तो वहीं खा -पीकर आए हैं ,यह तुम्हारा ही हिस्सा है ,इस पर वे लोग मर जाएंगे और मुद्राएँ हम आपस में बाँट लेंगे।
उधर जंगल में बैठे शेष दोनों सिपाहियों ने निश्चय किया कि जब बाजार वाले सिपाही लौटेंगे तो हम उन दोनों को गोली से  मार देंगे और धन आपस में बाँट लेंगे।
बाजार वाले सिपाही जैसे ही लौटे ,इन्होंने एक -एक को अपनी बंदूकों से ठंडा कर दिया और लगे खाने -पीने ,परन्तु उसमें तो विष मिला था। जल्दी ही वे दोनों भी सदा -सदा के लिए वहीं लेट गए।
थोड़ी देर बाद साधु बाबा लौटे तो चारों लाशों को देखकर हंस पड़े और बोले वाह री डायन ! चारों को खा गई और तू ज्यों -की -त्यों यही बैठी है।
डायन रूपी माया के लिए पाप मत करो। जीवन को निर्मल बनाओ। माया के प्रलोभन से बचो। ईश्वर भक्तों पर माया वार नहीं करती। सच्चा आस्तिक भौतिक भोगों के लिए कभी भी दुष्कृत्य नहीं करेगा। कामी और लोभी ही माया के शिकार होते हैं ,विरक्त नहीं।  
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Monday, July 23, 2018

तेज धूप न केवल त्वचा की बल्कि आंखो की भी दुश्मन होती है।

 Updesh Kumari     July 23, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

गर्मी अपने साथ कड़ी धूप ,झुलसी त्वचा ,सुस्ती और बदहजमी भी साथ  लाती है। दिनभर प्रदूषण ,सूर्य की पराबैंगनी किरणों और धुंए का सामना करते -करते रात तक त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता जवाब दे जाती है क्योंकि त्वचा के विटामिन सी और विटामिन ई के प्राकृतिक स्रोत लगभग समाप्त होने लगते हैं। वास्तव में सूर्य त्वचा का सबसे बड़ा दुश्मन है। यदि हम अधिक देर धूप में रहते हैं तो निश्चित रूप से त्वचा को नुकसान पहुंचेगा।
दरअसल ,सूरज की गर्मी ,प्रदूषण और धूल -मिटटी से अच्छी से अच्छी त्वचा भी खराब हो जाती है और कील -मुंहासे ,झाइयां ,भूरे काले दाग ,ब्लैक हेड ,झुर्रियों जैसी परेशानियां सामने आती हैं। कुछ लोगों की त्वचा तो इतनी कोमल होती है कि सूर्य की किरणोंके सम्पर्क में आने से उनकी चमड़ी काली पड़ जाती है।
गर्मी में धूप से हुई चिपचिपाहट के कारण अक्सर तैलीय त्वचा वाले लोग दिन में कई बार चेहरा धोते हैं। वास्तव में बहुत अधिक पानी या साबुन से चेहरा धोना भी नुकसानदायक है और इससे त्वचा के नार्मल सबस्टेंस खत्म होने लगते हैं और झुर्रियां पड़ने लगती हैं।
सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणें आंखों के लिए भी काफी नुकसानदायक साबित होती हैं। ये रेटिना पर सीधी चोट करती हैं। चूंकि स्वस्थ चमकी आंखें व्यक्ति की सुंदरता को दोगुना करती हैं इसलिए आंखों को भी सूर्य की किरणों से बचाना बेहद जरूरी हो जाता है।
बचाव के नुस्खें ---*सूर्य की किरणों से त्वचा को बचाने का सबसे अच्छा तरीका है कि किसी भी किस्म के कपड़े से त्वचा को ढ़ककर रखें। जहां यह सम्भव नहीं जैसे चेहरा ,हाथ आदि ,वहां किसी अच्छी कम्पनी का सनस्क्रीन क्रीम का इस्तेमाल करें। सनक्रीम दिन में तीन बार सुबह ,दोपहर और शाम को लगाएं।
*धूप में जाते समय जहां तक हो सके ,कोई इत्र या सुगंध न लगाएं। धूप से त्वचा में जलन होती है परिणामस्वरूप इत्र से मिलकर इससे त्वचा पर काले चकते पड़ सकते हैं।
*धूप में सिर पर दुपट्टा ,स्कार्फ या साड़ी का पल्लू लें ताकि बालों को नुकसान न पहुंचे। छाता ले जाना सबसे बेहतर होता है।
*धूप का चश्मा लगाएं ताकि आंखों और उसके नीचे की कोमल त्वचा को हानि न पहुंचे। सूरज की किरणों से आंखों के नीचे लकीरें पड़ने का खतरा रहता है।
*सूरज की सीधी किरणें त्वचा में कोलॉजोंन और इलास्टिक टिश्यू को खत्म कर देती है और उसका असर बढ़ता जाता है। सनक्रीम लोशन या सनब्लॉक धूप के खतरनाक असर को रोकने में मददगार साबित होते हैं।
           सनस्क्रीन क्रीम का प्रयोग धूप में निकलने से आधे घंटे पहले करें ताकि केमिकल्स त्वचा में घुलकर कार्य कर सकें। गर्मी की तेज धूप में निकलने से पहले यदि आप ये एहतियात बरतें तो त्वचा की कोमलता बनाए रखना आपके लिए आसान होगा।  कुछ महिलाएं पार्लर में सूरज से झुलसी त्वचा का समाधान पाने जाती हैं लेकिन ,धूप में अधिक रहने से यदि त्वचा पर रैश आदि हो जाएं तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से मिलना अधिक हितकर होता है।












Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Sunday, July 22, 2018

खुश होने की बजाय हम दौड़ते क्यों रहना चाहते हैं ?

 Updesh Kumari     July 22, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

हमारी अंतर्निहित और आनुवांशिक समस्या 'चिंतित 'बने रहने और 'कभी खुश न होने'की प्रवृति है। जरा सोचिए तो पिछली बार आपने कब निखालिस ख़ुशी महसूस की थी? फिर सोचें कि कितने वक्त वह ख़ुशी बनी रही थी ?हम ट्रेन  की तरह हैं -ऐसी ट्रेन जो  सिर्फ महत्वपूर्ण स्टेशनों से गुजरते रहना चाहती है। यह उन स्टेशनों (आपके जीवन के लक्ष्य )पर कुछ देर रूकती जरूर है ,लेकिन इस ट्रेन में वहा विश्राम करने की काबिलियत नहीं है ,क्योंकि यह अगले स्टॉप को लेकर चिंतित रहती है।
इसके लिए एक कारण तो यह है कि हम अपने आसपास इतनी ट्रेनें घूमते देखते हैं। हम उन्हें तेजी से पहुंचते देखते हैं ,इसलिए हम सर्र -से गुजर जाते हैं। फिर हमारे अहंकार को सहलाने के लिए हम हमसे धीमे चलने वाली ट्रेन को देखकर बड़ी राहत महसूस करते हैं। हम जताते तो यहीं हैं कि दोस्त की अधिक तेज ट्रेन पर हम खुश हैं लेकिन ,वास्तव में हम कभी खुश होते नहीं।
हम तो खुश होना ही नहीं चाहते। यदि हमे चिंता का कारण नहीं मिलता तो हम खोज निकलते हैं। हम चुपके से यह भरोसा करने लगे हैं कि चिंता ही तरक्की का ईंधन है। डिस्को व पार्टियां हमें शायद हमें शायद ही ख़ुशी देती हो। हमारी छुट्टियां हमें ऊर्जावान बनाने की जगह थकाने वाली ज्यादा होती हैं।
हमें दूसरों में खामियां निकालना बहुत पसंद है। जब हम किसी से श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं तो बहुत अच्छा लगता है। जो हमारी प्रशंसा करते हैं ,सहमत होते हैं ,तोहफे देते हैं या हमारे काम करते हैं तो हम उन्हें अच्छा कहते हैं। जो ऐसा नहीं करते वे अच्छे नहीं होते।
हमारे भीतर क्या है उसकी बजाय हमारा बाहरी रूप -रंग हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। भीतर से हम थके हुए हैं और शाश्वत चिंता में बने रहते हैं। दुर्भाग्य से हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं ,जिनमें अनावश्यक चीजें हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता हो गई हैं। तो इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या है ?एक ही जिंदगी है और आपको ऐसा माहौल तैयार करना होगा कि आपके सबसे बड़े आइडिया आपके दिमाग में प्रवाहित होने लगे।
जिंदगी 20 चीजें सही करने का नाम नहीं है बल्कि 3 -4 चीजें एकदम सही करना जिंदगी है। शेष 16 -17 चीजें सिर्फ बेकार का आकर्षण है। जिंदगी को साल बनाकर धीरे -धीरे ऐसे बन जाये कि उन बेकार के आकर्षणों को छोड़ सकें। हमारी ऊर्जा को हम जितना बिखरा देते हैं ,'वास्तविक लक्ष्यों 'की ओर ऊर्जा लगाने में हम उतने ही असमर्थ होते जाते हैं ,इसीलिए अनुशासन और अत्यधिक इच्छा शक्ति जरूरी है। अपनी तूफानी भाग -दौड़ पर विचार कीजिए और सोचें कि आप सिर्फ खुश होने की बजाय दौड़ते क्यों रहना चाहते हैं।







Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

जीवन में कुछ ऐसे सुझाव जिनकी मदद से मुश्किलें बेहद आसान हो जाती हैं।

 Updesh Kumari     July 22, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

कई बातें ऐसी हैं जिन्हें हम बचपन से सुनते आ रहे हैं ,लेकिन जीवन में अमल में नहीं ला पाते। जबकि इनकी मदद से मुश्किलें बेहद आसान हो सकती हैं। जानिए कुछ बिंदु --

  1. जिंदगी में हर चीज पहले से तय होती है ,फिर भी सामने आने पर हम उससे घबरा जाते हैं। जीवन  के हर पल का मजा लीजिए। मृत्यु जीवन का अंत है ,लेकिन इसका डर हमारी आत्मा को पहले ही खत्म कर देता है। 
  2. व्यस्त होना बेहतर कार्यक्षमता की निशानी नहीं होती। यह काम करने के बेतरतीब ढंग का परिचायक है। व्यस्त लोग अक्सर काम पूरा करने में देर करते हैं। वे काम से ज्यादा उसकी प्रक्रिया में उलझे होते  है, जिसका कार्यक्षमता  से खास संबंध नहीं होता। 
  3. दूसरों की गलतियों के लिए माफ़ी की अपेक्षा न रखें। इससे सीख  लेकर आगे बढ़ें क्योंकि बीती हुई बातें आने वाले कल की खुशियां कम करती हैं। माफ़ी देने का मतलब दोषी को अपराधमुक्त घोषित करना नहीं है ,बल्कि स्वयं को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाना है। 
  4. आपके विचार और आपकी सोच सबसे मेल नहीं खा सकते। इसके लिए प्रयास करना भी व्यर्थ है। बेहतर है कि ऐसे लोगों को अपनी जिंदगी से दूर रखें। यदि किसी के साथ आप खुद को छोटा अनुभव करते हैं या असहज रहते हैं तो उनसे परहेज करें। 
  5. एक्शन के बिना ज्ञान का कोई मतलब नहीं होता। केवल सोचने से काम कभी पूरा नहीं होता। कामयाबी उन्हें नहीं मिलती जो इसकी प्रतीक्षा करते हैं बल्कि उन्हें मिलती है जो इसके लिए कोशिश करते हैं। सही समय और अवसर की प्रतीक्षा करने वाले पूरी जिंदगी प्रतीक्षा ही करते हैं। 
  6. धैर्य`का मतलब केवल प्रतीक्षा करना नहीं बल्कि पूरी ताकत से लगातार प्रयास करने से है। किसी काम की शुरुआत करने से वह पूरा नहीं होता ,न ही अधूरे प्रयासों से कुछ हासिल होता है। इसके लिए अपने कंफर्ट जोन से बाहर आना होगा ,संबंधों से दूरी बनानी होगी और सम्भव है ताने भी सुनने पड़ें ,लेकिन यही कामयाबी की बुनियाद होती है। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Saturday, July 21, 2018

हर काम का शॉर्टकट ढूंढने में होती हैं गलतियां ,सजग रहें।

 Updesh Kumari     July 21, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

उम्र बढ़ने के साथ जिंदगी मुश्किल होती जाती है। दरअसल ,हम खुद ही इसे मुश्किल बनाते हैं। हर काम को शॉर्टकट तरीके से ज्यादा  चाहते हैं और प्रयत्न कम करते हैं। कुछ आसान तरीक़े हैं जिनकी मदद से मुश्किलों को कम कर सकते हैं। कैसे, जानिए कुछ सुझाव --
*उम्र के साथ अपना नजरिया विकसित करना भी आवश्यक है। अपने दिल की आवाज सुनिए और जरूरी हो तो लीक से हटकर काम कीजिए।
*ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखें जो आपको पसंद नहीं करते या जिन्हें आप पसंद नहीं करते। भले ही वे कोई रिश्तेदार या सहकर्मी ही क्यों न हों। कोई आपकी भावनाओं का अपमान करे ,नीची निगाहों से देखे या परेशान करने की कोशिश करे ,तो उसे अपने आसपास भी न रखें।
*हर किसी से अपनी तुलना मत कीजिए। इससे आप खुद को ही छोटा महसूस करेंगे। बेहतर है कि अपने आप से खुद की तुलना करें। पहले क्या थे और अब क्या हैं ,ये सोचने से आपके मन से ईर्ष्या का भाव दूर होगा।
*तनाव और चिंता से दूर रहने का एक आसान उपाय है कि खुद को दूसरों की भलाई में व्यस्त रखें। ज्यादा समय दिए बिना भी आप यह आसानी से कर सकते हैं। जीवन से हमेशा लेने की बजाय कभी देने के बारे में भी सोचिए।
*सही काम जितना जरूरी है ,उतना ही जरूरी सही तरीके से करना है। इसी तरह सभी काम करें न कि आसानी से होने वाला काम। अगर आप काम का शॉर्टकट ढूंढेंगे तो गलत रास्ता अख्तियार करना ही होगा।
*दूसरों से तवज्जो की बजाय सम्मान पाने की कोशिश करें। ऐसा काम करें ,जिनका लम्बे समय तक प्रभाव रहे। लोकप्रियता क्षणिक होती है लेकिन प्रभावी होने का मतलब है आप दूसरों से जीवन बेहतर बनाने में सफल रहे हैं।
*कई बार दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने के प्रयास में हम जीने का अपना तरीका ही भूल जाते हैं। यदि आपके चलते किसी को दुःख नहीं हो रहा है तो जिंदगी अपने तरीके से जीने में कोई बुराई नहीं है। रिश्ते खत्म होने में समय नहीं लगता लेकिन अपनी जिंदगी हमें खुद ही जीनी है।
*कोई एक दिन निश्चित करें कि नेगेटिव चीजें बिलकुल नहीं सोचेंगे। गॉसिप ,झूठ या धोखा कभी न कभी हम सबके साथ होता है। इससे आप भी बच नहीं सकते ,लेकिन कई चीजें अच्छी भी होती हैं। उनके बारे में सोचिए। इससे अलग तरह की ऊर्जा मिलेगी।













Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Monday, July 16, 2018

निराशाजनक स्थिति में हालात नहीं अपना नजरिया बदलें।

 Updesh Kumari     July 16, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

निराशा से बचने का एक तरीका यह है कि किसी से कोई उम्मीद मत रखिए। इसके लिए कुछ सुझाव है -

  1.  अच्छी बातों को याद रखिए और बुरी बातों को भूल जाइये। अच्छे और बुरे का चुनाव अपनी मर्जी से कीजिए। दूसरों से प्रभावित मत होइए। 
  2. लगातार उलझन में हैं तो एक ब्रेक लीजिए। कुछ समय के लिए बिलकुल अलग काम कीजिए। इससे चीजों को देखने का न्य नजरिया मिलता है। 
  3. हर परिस्थिति को बदला नहीं जा सकता। अपना ध्यान उन्हीं पर केंद्रित कीजिए ,जिन्हें बदल सकते हैं। जिन्हें नहीं बदल सकते ,उन्हें देखने का नजरिया बदलिए। हालात खुद बदल जाएंगे। 
  4. बीते हुए समय से सीखते हैं जबकि आने वाला समय हमें योजना बनाने का अवसर देता है। लेकिन इनके बारे में कोई नकारात्मक विचार आते ही अभी नये पर ध्यान केंद्रित कीजिए। 
  5. खुद पर भरोसा करेंगे ,तभी दुनिया आप में भरोसा करेगी। अपनी क्षमता को कभी कमतर मत आंकिए। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Sunday, July 15, 2018

दुनिया का सबसे छोटा देश वेटिकन सिटी

 Updesh Kumari     July 15, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

आपको जानकर यह हैरानी होगी कि दुनिया में एक ऐसा देश है ,जो भारत के एक छोटे -से जिले से भी बहुत छोटा है। वेटिकन सिटी का क्षेत्रफल केवल 0 `4 वर्ग किलोमीटर है। यहां पर रहने वालों की संख्या लगभग 1000 के आसपास है। वेटिकन सिटी आर्थिक ,सामाजिक ,राजनैतिक दृष्टि से सुदृढ़ है। यह एक स्वतंत्र देश है। यहां पर रोमन कैथोलिक धर्म को विशेष महत्व प्राप्त है। वेटिकन सिटी और यहां के रोमन कैथोलिक को इटली में 1984 में धर्मसंधि के दौरान विशेष स्थान मिला।
वेटिकन सिटी विकसित देशों की श्रेणी में आता है। यहां पर धर्म की पूरी स्वतंत्रता है। वेटिकन सिटी की भौगोलिक स्थिति बहुत अच्छी है। यहां की राजधानी का नाम 'वेटिकन सिटी 'है। यहां पर मुख्यतः इटालियन ,लेटिन ,फ्रेंच और अन्य भाषाएं भी बोली जाती हैं।
वेटिकन  छोटा जरूर है ,परन्तु एयरपोर्ट ,रेलवे स्टेशन ,बस स्टॉप ,इंटरनेट की सुविधाएं किसी भी विकसित राष्ट्र की तुलना में कण नहीं हैं।
वेटिकन सिटी में यूरो मुद्रा का चलन है। यहां पर काइन ,मेडल्स ,पोस्टेज स्टाम्प आदि की छपाई की जाती है ,जिससे विश्व बैंकिंग में वेटिकन सिटी को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।   
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Saturday, July 14, 2018

ऐसे यादगार पल जिनसे सोचने के तरीके में आ सकता है बदलाव।

 Updesh Kumari     July 14, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

जिन्दगी में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें याद रखने से  सोच में या सोचने के तरीके में बदलाव लाया जा सकता है। ऐसी ही कुछ बातों  के बारे में आज बताया जा रहा है। यह आपके लिए फायदेमंद रिमाइंडर बन सकते हैं - 1 1जीवन में जो कुछ होता है वे आपको आगे बढ़ने में मददगार रहता है ,फिर चाहे अभी आप चीजों को सामने देखने में विफल हो रहे हैं।
 2 लोगो और परिस्थितियों के बारे में जैसा आप आज सोच रहे हैं समय के साथ उसमे भी बदलाव आने लगता है और यही ठीक भी है। ऐसा होना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा न सोचिए।
 3 आप कितना खुश रहते हैं ,यह बात आपके विचारों पर निर्भर करती है। जैसी सोच ,वैसा जीवन बन जाएगा।  4 जिंदगी में एक पल को भी बर्बाद न करें। आपका जन्म ही दूसरे लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए हुआ है। निश्चित ही किसी न किसी के जीवन में बदलाव आएगा।
5 चाहे आपने अब तक काफी बदलाव कर लिए हैं ,लेकिन भविष्य में आपको ज्यादा बड़े और महत्वपूर्ण बदलाव करने होंगे। खुद को इन बदलावों के लिए तैयार रखिए।
6 आपको जो भी जरूरतें हैं उन्हें पूरा कीजिए ,क्योंकि खुद की जरूरतों को पूरा करके आप अपनी और दूसरों की जरूरतों को पूरा करने के काबिल बन सकेंगे।
7 जैसे ही कहा  जाता है कि भगवान ने सब कुछ पहले से ही तय किया हुआ है। इसलिए वे आपकी जिंदगी में लोगों को भेजता है। आपके जीवन में आने वाला हर व्यक्ति किसी न किसी कारण से आता है। बिना कारण कुछ नहीं होता है।
8यह जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। जो लोग सबसे ज्यादा शिकायत करते हैं ,वे सभी लोग जीवन में सबसे कम हासिल करते हैं। यह नियम सिर्फ प्रोफेशनल जिन्दगी में लागू नहीं होती है। निजी जिंदगी में बार -बार एक दूसरे को शिकायत करने से रिश्तों में कड़वाहट आती है।   
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg

Friday, July 13, 2018

कोई भी व्यक्ति ख़ुशी या उत्साह के बिना जीवित नहीं रह सकता।

 Updesh Kumari     July 13, 2018     Gyaan Sangam     No comments   

ये विचार हैं -महान विद्वान सेंट थामस एक्विनास के -जो मध्ययुग के सबसे महान राजनीतिक विचारक माने जाते थे। इन्होंने जीवन से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है। आइये जाने कुछ महत्वपूर्ण बिंदु -
  1.  जिन चीजों से हम प्यार करते हैं उन्हीं से पता चलता है कि हम कौन हैं। 
  2. अच्छाई ,बुराई के बिना  रह सकती ,लेकिन बुराई कभी अच्छाई के बिना नहीं रह सकती हैं। 
  3. दुनिया में दोस्ती से ज्यादा बहुमूल्य या कीमती कुछ भी नहीं हैं। 
  4. जरूरी नहीं कि मुशिकल काम करने से ही फायदा होता है या सफलता मिलती है। 
  5. मनुष्य को कभी चीजों में सुख नहीं तलाशना चाहिए। ये दुनियादारी की चीजें हैं। इसलिए जब किसी को इनकी आवश्यकता हो तो ें चीजों को उनके साथ बांटिए। 
  6. अच्छा जीवन जीने के लिए काम में अच्छा होना जरूरी है। अपनी गतिविधियों को अच्छा रखिए। 
  7. मनुष्य द्वारा किये जाने वाले सभी प्रयास आपको एक नई और ऊंची उड़ान भरने से रोक नहीं सकता है। 
  8. अगर कप्तान का केंद्र जहाज को सुरक्षित रखना है तो वह जहाज को कभी समुन्द्र में नहीं उतरने देगा। उसे पोर्ट में ही रखेगा। 
  9. मनुष्य को तीन बातें जानना जरूरी हैं -पहला ,किन चीजों की ख्वाहिश रखनी है। दूसरा ,किन बातों में विश्वास करना चाहिए। तीसरा ,कौन -से काम करने चाहिए। 
  10. कोई भी व्यक्ति ख़ुशी या उत्साह के बिना जीवित नहीं रह सकता है। इसलिए अगर मनुष्य को उत्साह न मिले तो उसका रुझान दूसरी चीजों की तरफ होने लगता है। 
Read More
  • Share This:  
  •  Facebook
  •  Twitter
  •  Google+
  •  Stumble
  •  Digg
Older Posts Home

About Me

My photo
Updesh Kumari
सुंदर विचारों को लिखकर प्रकट करना मेरी आदत में शुमार है। मैने सन 1995 में हिंदी साहित्य में (शिवप्रसाद का कथा साहित्य ) शोध प्रबंध लिखा था। मुझे अध्यापन कार्य करते हुए पच्चीस वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं। विचारों को एकत्रित कर सहेजना मेरी खूबी रही है। मुझे अपने विचार व्यक्त करना भी बहुत अच्छा लगता है। मुझे ये बतलाते हुए गर्व है कि मेरे द्वारा पढ़ाये गये छात्र शत -प्रतिशत परिणाम लाये हैं और उच्च पदों पर कार्यरत हैं। ये कहने की कोई आवश्यकता नहीं है कि विभिन्न कार्यक्रमों को संचालित करने का सदैव अवसर मिलता रहा है। मैं अपने पारिवारिक व कार्यस्थल से पूर्ण संतुष्ट हूँ। लिखना मेरा शौक है मजबूरी नहीं। मै आशा करती हू कि आप मेरे द्वारा लिखे गये को पसंद करेंगें।
View my complete profile

Popular Posts

  • अपशब्दों से अपनी ही वाणी गंदी होती है।
         हमें कभी किसी को गालियाँ नहीं देनी चाहिए ,न ही अपशब्द कहने चाहिए। ऐसा करना अशिष्टता और असभ्यता है गालियों से अपनी ही वाणी और मन दूषित ...
  • बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय।
    माता -पिता हमारे लिए पूजनीय होते हैं लेकिन उनकी वृद्धावस्था में जब हम उनका साथ नहीं दे पाते तो बाद में हमे बड़ा पछतावा होता है। सोहन को वृद्...
  • मानव -शरीर एक घोडा गाड़ी
    मनुष्य शरीर क्या है ?कठोपनिषद में मनुष्य शरीर की तुलना एक घोडा गाड़ी से की गई है मनुष्य के शरीर में दस इंद्रियां -पांच ज्ञानेन्द्रियां -...
  • सुविचार 22/9/2018 - Hindi Quotes
    निष्काम होकर पुरुषार्थ करने वाले को सफलता स्वयमेव प्राप्त होती है। -भारवि  सेवा सबकी करो परन्तु आशा किसी से मत रखो। यह संसार में रहने का...
  • बात पते की 27/7/2018 - Hindi Quotes
    जो भयभीत न हो ,वह आक्रामक नहीं होता। जिस व्यक्ति को कोई डर न हो वही स्वतंत्र व शांति से पूर्ण व्यक्ति है। -जेकृष्णमूर्ति  में प्रजातंत्र...

Blog Archive

  • ▼  2018 (171)
    • ▼  September (32)
      • सुविचार 27/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 26/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 25/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 24/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 23/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 22/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 21/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 20/9/2018 Hindi Quotes
      • सुविचार 20/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 19/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 18/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 17/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 16/9/2018 -Hindi Quotes
      • सुविचार 14/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 15/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 13/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 12/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 11/9/2018 Hindi Quotes
      • सुविचार 10/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 9/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 8/8/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 7/8/2018 - Hindi Quotes
      • अपशब्दों से अपनी ही वाणी गंदी होती है।
      • सुविचार 6/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 5/9/2018 - Hindi Quotes
      • माता के साथ -साथ पिता को भी देवतुल्य समझकर उनकी प...
      • सुविचार 4/9/2018 - Hindi Quotes
      • माँ का कलेजा बोला --मेरे बच्चे ! चोट तो नहीं आई कह...
      • सुविचार 3/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 2/9/2018 - Hindi Quotes
      • सुविचार 1/9/2018 - Hindi Quotes
      • मोक्ष प्राप्त करने का अवसर केवल मनुष्य जन्म में ही...
    • ►  August (36)
    • ►  July (58)
    • ►  June (45)

CATEGORIES

Gyaan Sangam (64) Hindi Quotes (102) हेल्थ (6)

Total Pageviews

Sample Text

Copyright © Gyaan Sangam | Powered by Blogger
Design by Sachin | Managed by Updesh Kumari