हेलो, जीवन ही नहीं मृत्यु भी पर्व की तरह लगे- मनुष्य अपने जीवन को इस तरह जिए कि मृत्यु भी पर्व की तरह सुखद हो |
मृत्यु आने पर मनुष्य को सुखद अनुभूति की तृप्ति मिले, जब नदी किसी महासागर मे मिलती है तो उसके बहाव में सागर
से मिलने की उमंग होती हे | हम भी मृत्यु को महासागर माने और जीवन को नदी की तरह मानते हुए तैयार रहें कि एक न
एक दिन सागर रुपी परमात्मा से मिलना है, परमात्मा से मिलने का जो उत्साह है उसका माध्यम मृत्यु ही तो है | लोग
मौत के भय से टूट जाते है क्योकि उन्होंने जीवन सही ढंग से व् सम्मानपूर्वक नहीं जीया | अतः जीवन में घटित विगत
सुखद पलों को मृत्यु से जोड़े तो मृत्यु के समय भी वैसी ही अनुभूति मिलेगी, अगर हमने अपना जीवन ईमानदारी से
व्यतीत किया है तो जिस दिन मौत आयेगीआप संतुष्ट होंगे कि इसी दिन का तो इंतजार था |
जीवन ही नहीं मृत्यु भी पर्व की तरह लगे
सुंदर विचारों को लिखकर प्रकट करना मेरी आदत में शुमार है। मैने सन 1995 में हिंदी साहित्य में (शिवप्रसाद का कथा साहित्य ) शोध प्रबंध लिखा था। मुझे अध्यापन कार्य करते हुए पच्चीस वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं। विचारों को एकत्रित कर सहेजना मेरी खूबी रही है। मुझे अपने विचार व्यक्त करना भी बहुत अच्छा लगता है। मुझे ये बतलाते हुए गर्व है कि मेरे द्वारा पढ़ाये गये छात्र शत -प्रतिशत परिणाम लाये हैं और उच्च पदों पर कार्यरत हैं। ये कहने की कोई आवश्यकता नहीं है कि विभिन्न कार्यक्रमों को संचालित करने का सदैव अवसर मिलता रहा है। मैं अपने पारिवारिक व कार्यस्थल से पूर्ण संतुष्ट हूँ। लिखना मेरा शौक है मजबूरी नहीं। मै आशा करती हू कि आप मेरे द्वारा लिखे गये को पसंद करेंगें।
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